तजुर्बे को तरजीह या युवा पर दांव? राजस्थान और MP में कांग्रेस के सामने यक्ष प्रश्न

मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने आखिरकार 15 साल के बाद वनवास खत्म कर लिया है. ‘शिवराज’ का अवसान होने के साथ ही मध्य प्रदेश में एक नए युग की शुरुआत होने वाली है. सबसे बड़ी पार्टी बनकर कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा तो पेश कर दिया है, लेकिन राहुल गांधी के सामने अभी भी एक सबसे बड़ा सिरदर्द है. सीएम पद के दो दावेदार और दोनों का ही मजबूत जनाधार. ठीक यही हाल राजस्थान में भी है.

कुर्सी पर कौन बैठेगा

मध्य प्रदेश में पिछले कई दशकों से जमीन पर काम कर रहे कमलनाथ हैं तो ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपनी विरासत सहेजते हुए राज्य में काफी सक्रिय हैं. दोनों के ही समर्थक जीत के जश्न में मदहोश हैं, लेकिन ताज किसके सिर सजेगा इस पर अब तक संशय बना हुआ है.

तजुर्बेकार कमलनाथ या युवा सचिन पायलट

कांग्रेस हाईकमान के सामने बड़ा सवाल है कि वो तजुर्बेकार कमलनाथ को आगे बढ़ाए या युवा जोश से लबरेज ज्योतिरादित्य सिंधिया पर दांव लगाए. दोनों ही नेताओं के समर्थकों को यकीन है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनका नेता ही काबिज होगा. हालांकि मंगलवार शाम को जीत का एहसास होते ही दोनों नेता एक साथ एक मंच पर भी आए, लेकिन उनकी शारीरिक भाव-भंगिमा साफ इशारा करती है कि अभी भी दोनों में तल्खी बरकरार है. दोनों ही अभी तक मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल पर अब तक मुंह नहीं खोला है. दोनों ने गेंद हाईकमान और जनता के पाले में डाल दी है.

राजस्थान में भी वही सवाल

राजस्थान में भी ठीक यही हाल है. यहां भी सचिन पायलट बेशक जीत के बाद मुख्यमंत्री के बड़े दावेदारों में हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता अशोक गहलोत के मुकाबले कम है. जनाधार के साथ-साथ अनुभव भी मुख्यमंत्री की रेस में गहलोत को पायलट से कहीं आगे खड़ा करता है.

गहलोत या सचिन

अशोक गहलोत बेशक राहुल गांधी का भरोसा जीतकर दिल्ली पहुंच गए हैं, लेकिन राजस्थान में उनकी सर्व स्वीकार्यता उनकी भव्य तरीके से जयपुर वापसी करा सकती है. इधर दोनों के समर्थक पार्टी मुख्यालय के सामने शक्ति प्रदर्शन कर पार्टी हाईकमान पर प्रकारांतर से दबाव भी बना रहे हैं. ऐसे में हाईकमान के सामने जीत के बावजूद कुर्सी किसे सौंपी जाए, इस पर फैसला करना थोड़ा मुश्किल हो रहा है. 2019 की ‘जंग’ को देखते हुए पार्टी  भी दोनों धड़ों को साधते हुए सीएम का चयन करेगी.

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